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खेजड़ी (Prosopis cineraria): राजस्थान का राज्य वृक्ष और जयपुर में इसे कैसे उगाएँ

Prosopis cineraria

खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है: यह भीषण गर्मी में भी हरी रहती है, मिट्टी को उपजाऊ बनाती है और सांगरी व चारा देती है। जानिए जयपुर में इसे कब और कैसे लगाएँ, पहले तीन साल कैसे सँभालें, और बिश्नोई समाज के लिए यह क्यों ख़ास है।

खेजड़ी (Prosopis cineraria): राजस्थान का राज्य वृक्ष और जयपुर में इसे कैसे उगाएँ

खेजड़ी (Prosopis cineraria) राजस्थान का राज्य वृक्ष है और उन गिने-चुने पेड़ों में से है जो रेगिस्तान के सबसे गर्म महीनों में भी हरे रहते हैं। इसकी गहरी जड़ें ज़मीन के भीतर की नमी तक पहुँचती हैं, यह मिट्टी को उपजाऊ बनाती है, और इसकी पत्तियाँ व फलियाँ पशुओं और परिवारों का पेट भरती हैं।

फ़ोटो: "A tree of Prosopis Cineraria in India", मुल्ख सिंह (Mulkh Singh), CC BY-SA 4.0, विकिमीडिया कॉमन्स के माध्यम से

एक नज़र में

वैज्ञानिक नामProsopis cineraria (L.) Druce
कुल (फ़ैमिली)फ़ैबेसी (दलहनी कुल)
हिंदी नामखेजड़ी; जंड और शमी भी कहते हैं
ऊँचाईआमतौर पर 5–10 मीटर; कुछ पेड़ 10–12 मीटर तक
बढ़ने की गतिशुरुआती वर्षों में ज़मीन के ऊपर धीमी
पानी की ज़रूरतजम जाने के बाद कम; पहले सूखे मौसमों में नियमित पानी
जयपुर में लगाने का सबसे अच्छा समयजुलाई–अगस्त (मानसून); दूसरा विकल्प सितंबर–अक्टूबर
जयपुर के लिए उपयुक्तताबहुत बढ़िया

जयपुर में खेजड़ी क्यों लगाएँ

खेजड़ी भारत के शुष्क और अर्ध-शुष्क उत्तर-पश्चिम की देसी पेड़ है। ICAR-CIAH (बीकानेर) के अनुसार यह लगभग 50 °C तक की गर्मी, गर्म लू, पाला और भारी सूखा सह लेती है, और साल में केवल 75–450 मिमी बारिश में भी उग जाती है। जयपुर में लगभग 600–650 मिमी बारिश होती है, जो इसके लिए आराम से काफ़ी है। CIAH के एक सर्वे में जयपुर ज़िले में भी खेजड़ी दर्ज की गई है।

खेजड़ी सबसे सूखे महीनों, मार्च से जून, में नई पत्तियाँ, फूल और फलियाँ देती है। यह क्षारीय मिट्टी सह लेती है (pH 9.8 तक की ज़मीन पर दर्ज), पर इसे पानी का अच्छा निकास चाहिए। कठोर परत के ऊपर की उथली मिट्टी या बहुत खारी मिट्टी में यह ठीक से नहीं बढ़ती। घनी छाया में इसके पौधे मर जाते हैं, इसलिए इसे केवल खुली धूप में लगाएँ।

इसे कैसे लगाएँ

कब लगाएँ

सबसे अच्छा समय जुलाई से अगस्त है, जब मानसून की बारिश नन्हे पौधे को मज़बूत मूसला जड़ बनाने में मदद करती है। नर्सरी के पौधों के साथ सितंबर से अक्टूबर भी ठीक है, बशर्ते पहले सूखे मौसम में पानी दिया जाए। अप्रैल से जून में न लगाएँ।

पौधा कैसा चुनें

नर्सरी का पौधा सबसे भरोसेमंद है; खेजड़ी कलम (कटिंग) से अच्छी तरह नहीं उगती। व्यावहारिक सलाह यह है कि 7–12 महीने पुराना, 30–60 सेमी ऊँचा पौधा चुनें, जो गहरी थैली में उगा हो ताकि मूसला जड़ मुड़ी न हो। अगर सांगरी जल्दी चाहिए, तो 'थार शोभा' जैसी चुनी हुई किस्मों के ग्राफ़्टेड पौधे (ICAR-CIAH) भी एक विकल्प हैं।

गड्ढा, दूरी और सुरक्षा

व्यावहारिक सलाह: 45–60 सेमी लंबा-चौड़ा-गहरा गड्ढा खोदें, निकली मिट्टी में अच्छी सड़ी गोबर की खाद मिलाकर भरें, और जहाँ दीमक ज़्यादा हो वहाँ नीम की खली डालें। पौधे को उतनी ही गहराई पर लगाएँ जितना वह नर्सरी की थैली में था। बगीचे या झुरमुट में पेड़ों के बीच 5–8 मीटर की दूरी रखें ताकि हर पेड़ पूरा फैल सके।

कम से कम दो-तीन साल तक ट्री-गार्ड ज़रूरी है, क्योंकि बकरियाँ और ऊँट छोटे पौधों को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं।

पहले साल पानी (व्यावहारिक सलाह)

  • जुलाई–सितंबर: केवल तब, जब 10 दिन या उससे ज़्यादा बारिश न हुई हो, लगभग 10 लीटर।
  • अक्टूबर–फ़रवरी: हर 10–15 दिन में, 10–15 लीटर।
  • मार्च–अप्रैल: हर हफ़्ते, लगभग 15 लीटर।
  • मई–जून: हर 4–5 दिन में, 15–20 लीटर, सुबह जल्दी या शाम को।

पहले तीन साल की देखभाल

मानसून (जुलाई–सितंबर). पौधे के चारों ओर थाली जैसा थावला बनाएँ। शुरुआत में बढ़त धीमी होती है, इसलिए पहले साल दो-तीन बार निराई करें; बाद में हल्की निराई काफ़ी है।

मानसून के बाद (अक्टूबर–नवंबर). थावले में 5–8 सेमी सूखी घास या पत्तियों की मल्चिंग करें। पहले साल हर 10–15 दिन, दूसरे साल हर 2–3 हफ़्ते, और तीसरे साल केवल लंबे सूखे में पानी दें।

सर्दी (दिसंबर–फ़रवरी). खेजड़ी को पाले से शायद ही कोई दिक्कत होती है। दीमक पर नज़र रखें। दूसरे साल से हल्की छँटाई करें ताकि तना सीधा बने।

वसंत (मार्च–अप्रैल). पहले साल हर हफ़्ते और दूसरे साल हर 10–14 दिन में पानी दें। तीसरे साल तक पेड़ ज़्यादातर बारिश के भरोसे चल जाता है।

गर्मी (मई–जून). यह सबसे नाज़ुक समय है: पहले साल हर 4–5 दिन और दूसरे साल हर 7–10 दिन में पानी दें। तीसरे साल केवल भारी सूखे में पानी दें।

कीट. सबसे बड़ा ख़तरा चरने वाले पशु हैं। तना और जड़ छेदक कीड़ों, मिलीबग और परजीवी बेल अमरबेल (Cuscuta) पर भी नज़र रखें; अमरबेल को हाथ से हटा दें। पहले तीन साल चारे के लिए पेड़ की कटाई-छँटाई (लोपिंग) न करें।

धीरज रखें

खेजड़ी पहले अपनी जड़ें गहराई तक भेजती है। बीज से उगे पौधे चार साल में केवल 1–2 मीटर तक पहुँच सकते हैं, और सुरक्षित पौधे लगभग 4–5 साल में आकार लेते हैं।

फ़ायदे

मिट्टी. खेजड़ी दलहनी पेड़ है जो नाइट्रोजन स्थिर करता है। इसकी छाँव के नीचे मिट्टी में जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस और कैल्शियम बढ़ते हैं।

भोजन और चारा. कच्ची फलियाँ (सांगरी) राजस्थान की जानी-मानी सब्ज़ी हैं और पंचकूटा का मुख्य हिस्सा हैं; पकी सूखी फलियाँ (खोखा) भी खाई जाती हैं। पत्तियाँ (लूँग) पौष्टिक चारा हैं जिन्हें पशु चाव से खाते हैं, ख़ासकर सर्दियों में जब दूसरा हरा चारा कम मिलता है। बीज से उगे पेड़ आमतौर पर 10–15 साल में नियमित फलियाँ देने लगते हैं; ग्राफ़्टेड पौधे 3–4 साल में शुरू कर सकते हैं।

पानी और खेती. इसकी गहरी मूसला जड़ ज़मीन की गहरी नमी लेती है, इसलिए यह पास की फ़सलों से पानी के लिए होड़ नहीं करती।

छाया और जीव-जंतु. यह हल्की, छनी हुई छाया देती है और गर्मियों में भी हरी रहती है, जिससे लोगों, पशुओं और वन्यजीवों को आसरा मिलता है। इसके वसंत के फूल शहद के लिए अच्छे माने जाते हैं।

ज़मीन और लकड़ी. रेत के टीलों को थामने के लिए खेजड़ी लगाई जाती है। इसकी सख़्त, भारी लकड़ी खंभों, निर्माण और ईंधन में काम आती है।

पारंपरिक उपयोग. इसकी छाल, पत्तियाँ और फूल आयुर्वेद और लोक-चिकित्सा में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होते रहे हैं। यह केवल पारंपरिक उपयोग की जानकारी है, चिकित्सा सलाह नहीं।

सांस्कृतिक महत्व

खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है, और 1988 में भारतीय डाक ने इस पर डाक टिकट जारी किया। शमी के रूप में हिंदू परंपरा में इसका आध्यात्मिक महत्व है: रामायण और महाभारत में शमी-पूजा का वर्णन मिलता है, और यज्ञ की पवित्र अग्नि जलाने में इसकी लकड़ी का उपयोग होता था। राजस्थान के कुछ हिस्सों में जन्माष्टमी पर खेजड़ी की हरी टहनियों की पूजा होती है।

बिश्नोई समाज गुरु जंभेश्वर की सीख पर चलते हुए हरे पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा करता है। 1730 में जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में अमृता देवी बिश्नोई और उनकी तीन बेटियों ने जोधपुर के शासक के निर्माण कार्य के लिए खेजड़ी के पेड़ काटे जाने से रोकने की कोशिश में अपने प्राण दे दिए। उनके बाद और भी बहुत से बिश्नोई आगे आए; आमतौर पर यह संख्या 363 बताई जाती है। राजस्थान सरकार के अनुसार इसी बलिदान ने आगे चलकर 1970 के दशक के चिपको आंदोलन को प्रेरणा दी।

सावधानियाँ और सुरक्षा

  • काँटे. इसकी डालियों पर काँटे होते हैं। इसे रास्तों और बच्चों के खेलने की जगह से दूर लगाएँ, और संभालते समय दस्ताने पहनें।
  • विलायती बबूल नहीं. खेजड़ी को Prosopis juliflora (विलायती बबूल) से न मिलाएँ। यह एक विदेशी प्रजाति है जो थार के चरागाहों और ओरणों (पवित्र वनों) में फैल गई है। पक्का करें कि नर्सरी असली Prosopis cineraria दे रही है।
  • विषाक्तता. पारंपरिक रूप से खाई जाने वाली फलियाँ ज़हरीली नहीं मानी जातीं, और पत्तियाँ व फलियाँ बकरी, ऊँट, गाय और भेड़ का मुख्य चारा हैं। लोक-मान्यता है कि ज़्यादा फल खाने से वह पचता नहीं। बिल्लियों और कुत्तों पर असर के बारे में जानकारी दर्ज नहीं है।
  • जड़ से नए पौधे. ज़्यादा नमी वाले इलाक़ों में यह जड़ों से नए पौधे निकालकर फैल सकती है; जयपुर में यह बड़ा ख़तरा नहीं है।
  • स्थायी जगह चुनें. राजस्थान में खेजड़ी काटने पर रोक है। फ़रवरी 2026 में राज्य ने खेजड़ी की कटाई पर पूरे प्रदेश में प्रतिबंध का आदेश दिया, और अगस्त 2026 में राज्य मंत्रिमंडल ने पेड़ों की सुरक्षा का एक विधेयक मंज़ूर किया जिसमें खेजड़ी शामिल है। इसे ऐसी जगह लगाएँ जहाँ यह हमेशा रह सके।

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रोपण कैलेंडर

  • उत्तर-पश्चिमी शुष्क क्षेत्र · मानसून · जुल॰, अग॰
  • उत्तर-पश्चिमी शुष्क क्षेत्र · मानसून के बाद · सित॰, अक्टू॰

रोपण के तरीके

पौध (नर्सरी का पौधा)मुख्य तरीका

दूरी: 5 x 5 m to 8 x 8 m for groves (2 x 2 m for dense block plantation) · गहराई: Same depth as nursery bag; pit 45-60 cm cube

बीज

दूरी: Direct sowing at final spacing during monsoon · गहराई: 1-2 cm; soak seed before sowing

ग्राफ्टिंग (कलम बाँधना)

दूरी: As for saplings · गहराई: Patch-budding of elite varieties (e.g., Thar Shobha) on Khejri rootstock

लाभ

  • मिट्टी का स्वास्थ्य: नाइट्रोजन स्थिर करने वाला दलहनी पेड़, जो अपनी छाँव के नीचे मिट्टी में जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस और कैल्शियम बढ़ाता है।
  • चारा: इसकी पत्तियाँ (लूँग) स्वादिष्ट और पौष्टिक चारा हैं, ख़ासकर सर्दियों में जब दूसरा हरा चारा कम मिलता है।
  • खाद्य: कच्ची फलियाँ (सांगरी) राजस्थान की जानी-मानी सब्ज़ी हैं और पंचकूटा का हिस्सा हैं; पकी सूखी फलियाँ (खोखा) भी खाई जाती हैं।
  • जल संरक्षण: इसकी गहरी मूसला जड़ ज़मीन की गहरी नमी लेती है, इसलिए यह पास की फ़सलों से पानी के लिए होड़ नहीं करती।
  • छाया और ठंडक: हल्की, छनी हुई छाया देती है और गर्मियों में भी हरी रहती है, जिससे लोगों, पशुओं और वन्यजीवों को आसरा मिलता है।
  • परागणकर्ता: वसंत (मार्च–मई) में भरपूर फूल आते हैं, जो शहद के लिए अच्छे माने जाते हैं।
  • जैव विविधता: थार का एक अहम पेड़, जो गर्मियों में वन्यजीवों का सहारा बनता है।
  • इमारती लकड़ी: सख़्त, भारी लकड़ी खंभों, निर्माण, औज़ारों के हत्थों और ईंधन में काम आती है।
  • औषधीय: छाल, पत्तियाँ और फूल आयुर्वेद और लोक-चिकित्सा में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होते रहे हैं। यह केवल पारंपरिक उपयोग है, चिकित्सा सलाह नहीं।
  • सांस्कृतिक: राजस्थान का राज्य वृक्ष, शमी के रूप में पूजनीय, और बिश्नोई परंपरा व 1730 के खेजड़ली बलिदान से गहराई से जुड़ा।
  • अन्य: रेत के टीलों को थामने और बंजर ज़मीन सुधारने के लिए लगाई जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या मेरी खेजड़ी जयपुर की गर्मी झेल पाएगी?

हाँ। यह भारत के सबसे ज़्यादा गर्मी और सूखा सहने वाले पेड़ों में से है। पहले दो सूखे मौसमों में हम इसे पानी देते हैं और ट्री-गार्ड से बचाते हैं।

मेरा पेड़ इतना धीरे क्यों बढ़ रहा है?

खेजड़ी पहले अपनी जड़ें ज़मीन में गहराई तक भेजती है, इसलिए शुरुआती कुछ सालों में ऊपर से धीरे बढ़ती है। यह सामान्य है।

सांगरी कब मिलेगी?

बीज से उगे पेड़ आमतौर पर 10–15 साल लेते हैं; ग्राफ़्टेड (बडिंग वाली) किस्में 3–4 साल में फलियाँ देने लगती हैं।

क्या खेजड़ी और काँटेदार "विलायती बबूल" एक ही हैं?

नहीं। खेजड़ी देसी पेड़ है; विलायती बबूल (Prosopis juliflora) एक विदेशी आक्रामक झाड़ी है। हम केवल असली खेजड़ी लगाते हैं।

राजस्थान में खेजड़ी ख़ास क्यों है?

यह राज्य वृक्ष है, सूखे में लोगों और पशुओं का सहारा है, और बिश्नोई समाज इसका सम्मान करता है, जिसके लोगों ने 1730 में खेजड़ली में इसकी रक्षा के लिए प्राण दिए।

स्रोत

  1. Kew, World Checklist of Vascular Plants: Prosopis cineraria (via GBIF)
  2. ICRAF Agroforestree Database: Prosopis cineraria species profile
  3. Flowers of India: Khejri Tree
  4. ICRAF Agroforestree Database PDF: Prosopis cineraria
  5. Samadia D.K., Haldhar S.M. et al. (2021). Khejri (Prosopis cineraria) research for horticultural harnessing and environmental services: an appraisal. Journal of Agriculture and Ecology 12:1–26, ICAR-CIAH Bikaner
  6. Government of Rajasthan (Rajasthan Foundation): Khejri, State Tree of Rajasthan
  7. Drishti IAS: Felling of Khejri Trees
  8. Wikipedia: Khejarli massacre
  9. Drishti IAS: Eradication of Vilayati Babool
  10. Free Press Journal: Rajasthan Bans Khejri Tree Felling After 11-Day Protest (13 Feb 2026)
  11. Drishti IAS: Rajasthan Imposes Statewide Ban on Felling of Khejri Tree
  12. Social News XYZ (IANS): Rajasthan cabinet clears draft bills on tree protection and UCC (13 Aug 2026)

यह लेख AI की सहायता से तैयार किया गया है। महत्वपूर्ण जानकारी की पुष्टि दिए गए स्रोतों से करें।

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